A day at Bangla Sahib Gurudwara!

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आज  तक जो दिदिया अपने फ़ोन में नंबर भी अपने दोस्त से सेव करवाती थी , व्हात्सप्प, फेसबुक पर अकाउंट

तो बना लिया था पर स्टेटस लिखने से घबराती थी उनके दिल के कोने में कही न कही ये अरमान तो था  केवो भी

पढ़े message  लिखे पर ये सोचकर  रुक  जाती  थी की वह नहीं पढ़ सकती हे।  पर शायद भगवान्को कुछ  और

ही करना था उनके जीवन को शब्दों से  रंगना था इसलिए  उसने कुछ लोगो को वहा पढ़ने का होसला दिया तो वही

 दिद्यो के दिल में पढने के अरमान को फिर से जिन्दा कर दिया और पढने का एक खुबसूरत सिलसिला शुरू

हुआ।  एकदिन  युही  मैंने बातो बातो में कहा  की किताबो का  मेला लगा हे और उन्होंने बड़े उत्साह के साथ वहा

जाने की इच्छा जाहिर की और ३० अगस्त २०१३ को सुभह सुभह सूरज की नर्म किरणों में मैंने उन दो जगमगाते

चेहरों को देखा जो अभी तक किताबो केनाम सेदर जाते थे आज वही किताबो के मेले में जाने के लिए अपनी नींद

गवा  कर आये हे १०.३० बजे हम किताबो के मेले में पहुचे वो किताबो को इस तरह छु रहे थे की मानो किसी ने उनकी

कोरी हथेली पर चाँद रख दिया हो. उनकी चेहरों पर वो प्यारी सी मुस्कान मेरे दिल को एक अनचाही ख़ुशी देरही थी।

मैं हैरान थी  उनको देखकर की जो कल तक किताबो और शब्दों से डरती थी आज वही दिदिया मोटी  मोटी किताबे

अपने आप खरीद रही हे। वो चाहती थी की अपने छोटी से थैले में सारी किताबे भर ले।  उन्हें देख मुझे  लग रहा  था

 के छोटे से बच्चे के सामने  सारी  दुनिया की खुशिया बिखेर दी  गयी  हो और वो अपने छोटे छोटे हाथो सेहर एक ख़ुशी

को अपने झोली में भरना चाहता हो। आज मैंउस ख़ुशी को मह्सुश  कर रही थी जिसको शायद मैं आजतक हर जगहधुंद रही थी

 

– Firdoz

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